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Monday, 5 September 2011

हिंदु अंतरमन की वेदना का ज्वालामुखी

-          आनंद शुक्ल

भारत में विश्व में सबसे ज्यादा हिंदुओं का निवास है. भारत एक राष्ट्र के रूप में सनातन काल से हिंदु रह्या है. हालाकि भारत के हिंदुओं का दुर्भाग्य है कि वह हिंदु राज्य नहीं है. भारत में हिंदुओं की राजनीतिक आकांक्षाओं की पूर्ति केलिए 64 वर्ष पहले मिली खंडित आजादी से अब तक कोई व्यवस्था नहीं है. भारत में हिंदुत्व का झंडा लेकर घुमनेवाले कुछ राजनीतिक पक्षो का उदय हुआ और उसमे से एकाद पक्ष अभी जीवित है. भारतीय जनसंघ की स्थापना हिंदुत्व की विचारधारा के आधार पर की गई थी. तो आपातकाल के बाद जनता पार्टी में दो सभ्यपद के विवाद के कारण अलग होनेवाले जनसंघीओंने भाजप की स्थापना की थी. परंतु भाजप भी गांधीवादी समाजवाद और बाद में हिंदुत्व के वैचारीक मार्गो पर अस्पष्टताओं और असमंजसताओं के साथे आगे बढा. रामजन्मभूमि आंदोलनने भारतीय राजनीति का हिंदुकरण करने का काम किया. भारतीय राजनीति में नई दिशा ईसी आंदोलनने खोली. 1997 तक लग रह्यां था कि हिंदुओं को खंडित आजादी के बाद अब अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं की पूर्ति केलिए कोई उचित राजनीतिक अभिव्यक्ति का साधन भाजप के रूप में मिल गया है. 


किन्तु भाजप द्वारा अपने आप को सेक्युलर दिखाने के शोख के कारण हिंदुओं के मुद्दे और उनकी ऊचित राजनीतिक अभिव्यक्ति को भारत की राजनीति में कोई स्थान नहीं है. हालाकि भाजपने एनडीए के तेहत सत्ता का पूर्ण स्वाद चखने के बाद जाहिर किया कि उनकी विचारधारा हिंदुत्व की है. लेकिन सत्ताकाल के वर्षो के दैरान भाजपने रामजन्मभूमि पर भव्य राममंदिर निर्माण, जम्मु-काश्मीर में से आर्टीकल-370 को हटना और समान नागरीक कानून को लाने के मुद्दो को कोमन मिनिमम प्रोग्राम के बहाने अपने से दूर रखा था. भाजपने गठबंधन राजनीति का अनिवार्यपन दर्शाते हुए, ईन सभी मुद्दो को अपने चूनावी मेनिफेस्टो में जरूर से रखा था. ताकि कोई यह कहे न शके कि उन्होंने हिंदुत्व की विचारधारा से जुडे ईन मुद्दो के साथ कोई समझौता कर लिया है. लोकसभा प्रतिपक्ष की नेता और भाजप की वरिष्ठ नेत्री श्रीमती सुष्मा स्वराजने अपने एक वक्तव्य में रामजन्मभूमि मंदिर मुद्दे को एनकैश हुए चैक के समान बताकर अपने हाथ खिंच लिए. भाजप के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नक्वीने भी हिंदु जनभावना को आहत करनेवाला निवेदन देकर रामजन्मभूमि पर भव्य राममंदिर के सवाल पर जवाब दिया था कि भाजप कोई कन्स्ट्रकशन कंपनी नहीं है. भाजप के ईन नेताओं के रामजन्मभूमि मामले में अभिव्यक्त होते विचार और अभिप्रायों से उनका हिंदुत्व के प्रति घट रहा आग्रह स्पष्ट रूप से दिखाय देता है.

कुछ संतों और हिंदुवादी संगठनो के कार्यकर्ता दबी जुबान में कहेते सुने जाते है कि भाजप कॉंग्रेस में और कॉंग्रेस मुस्लिम लीग में परिवर्तित हो चुकी है. भाजप और कॉंग्रेस की कथनी-करनी से हिंदु समाज की ईस निराशा कोई इन्कार कर नहीं शक्ता. भाजप के कॉंग्रेसीकरण की बात बहोत सारे राजनीतिक विश्लेषक हंमेशा से करते आये है. पार्टी विथ डिफरन्स मुस्लिम तुष्टिकरण, भ्रष्टाचार, उदारवाद, भूमंडलीककरण, विनाश की ओर जाता विकास की विकृत अवधारणाओं के मुद्दो पर कॉंग्रेस जैसा ही अभिप्राय रखती है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चिंतक मा. गो. वैद्यने तत्कालिन परिस्थितिओं के मुताबिक भाजप और कॉंग्रेस को साथ में मिलकर सरकार बनाने की बात कही है. हिंदु विचारधारे के प्रवर्तमान पावर हाऊस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक पद पर आसिन होने के समय मोहनराव भागवतने भाजप की सर्जरी और किमोथैरपी देने की बात भी की थी. हालाकि अहेमदाबाद में आयोजित एक सेमिनार में सरसंघचालक मोहनराव भागवतने नई राजनीतिक पार्टी बनाने की बात पर यह कहेते हुए पूर्णविराम रखा था कि हमारे पार अभी दीनदयालजी जैसे ऊंचे कद के नेता नहीं है. उन्होने कहा था कि हम भाजप को सुधारेंगे. चर्चा ऐसी भी है कि नया पक्ष बनेंगा, तो वह नया पक्ष भी भाजप की तरह नहीं बनेगा उसकी कोई गेरेन्टी दे शकता है?

लेकिन हिंदुवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं की व्यथा ऐसी है कि हिंदु संगठन सक्रिय बन के कोई काम करते है, तो उसका राजनीतिक लाभ भाजप को ही होनेवाला है. यू देखा जाये तो हिंदुवादी संगठनो का कार्य भाजप केलिए मतो में परिवर्तित होता रहा है. लेकिन उसकी कोई राहत हिंदुवादी संगठनो को नहीं हो रही है. हिंदुवादी संगठनो और उनके कार्यकर्ताओं के साथ भाजप द्वारा कॉंग्रेस से भी खराब बर्ताव होने के कई उदाहरण है. ऐसी परिस्थिति में हिंदुवादी संगठन में ऐसी भावना देखी जा शक्ती है कि गाय का दोहन कर के कूत्तियां को दूध पिलाने जैसी स्थिति है और हद तो तब होती है कि वह कुत्तियां दूध पिलाने वाले को ही काटती है, तो.. इसका ईलाज क्या है? प्रवर्तमान राजनीतिक परिस्थितिओं में हिंदु जनता अपने आप को राजनीतिक क्षेत्र में अनाथ समज रही है. यह परिस्थिति कॉंग्रेस और वामपंथीओं के साथे सेक्युलर होने का दम भरनेवाले दंभी छोटे-मोटे राजनीतिक पक्षों केलिए बहोत ही अनुकूल है. ईन परिस्थितिओं के चलते हिंदुवादी संगठनो में सब से ज्यादा प्रभावी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर्वोच्च नेता सरसंघचालक मोहनराव भागवत कोई परिणाम मिले ऐसी सर्जरी और कैमोथैरपी कर पाये हो ऐसा दिखाई नहीं दिया है.

हिंदु समाज के विश्वास और भावनाओं का राजनीतिक लाभ लेकर सत्तासुख भोगने के बाद उनसे घात करना कोई नई बात नहीं है. आजादी के पहेले कॉंग्रेस को हिंदुओं का सबसे ज्यादा समर्थन था. कॉंग्रेस 1935 और 1946 के प्रांतिय चुनावोमें काफी प्रदेशो में सत्ता में आई, उस केलिए उसे हिंदु जनसमुदाय का प्रचंड समर्थन था. मुस्लिम लीग के नेता महंमदअली जिन्ना कॉंग्रेस को हिंदुओं की पार्टी और महात्मा गांधी को हिंदु नेता कहते थे. हालाकि महात्मा गांधी को हिंदु-मुस्लिम एकता के निष्फल प्रयोग करने में और कॉंग्रेस को मुस्लिमो का भी समर्थन प्राप्त है ऐसी पार्टी दिखाने केलिए गहेरी राजनीतिक आकांक्षा थी. उसके कारण भारत को जो नुकसान हुआ है, वह किसिसे भी छिपा नहीं है. सनातन काल से अखंड हिंदु राष्ट्र, कॉंग्रेस और महात्मा गांधी की हिंदु हितो की सुरक्षा करने में अक्षम नीतिओं के कारण खंडित हुआ. भारत के टुकडे करके पाकिस्तान नामका मुस्लिम राज्य बनाया गया, तो खंडित भारत को हिंदु राज्य बनाने की बजाय तत्कालिन नेताओंने उसे सेक्युलर राज्य बनाया. हिंदु मन की वेदना है कि सेक्युलारिज्म की माला जपनेवाले ईन नेताओंने अपने दंभ को जीवित रखने केलिए भारत को हिंदु राज्य क्यों नहीं बनने दिया? भारत को हिंदु राज्य बनाया जाये या नहीं, उस केलिए जनता के किसी प्रकार के जनमत लेने कि तत्कालिन नेताओंने जरा भी चेष्टा नहीं की. 

महात्मा गांधीने नेहरु-सरदार को पाकिस्तान के आक्रमक रवैये के बावजूद 55 करोड रूपयें देने केलिए अनशन के द्वारा बाध्य कर लिया था. गांधीजीने उस वक्त अपने अनशन तोडने केलिए एक दूसरी शर्त रखी थी कि दिल्ही की मस्जिदों में शरण लिए हुए हिंदु-शीख शरर्णार्थीओं को उन मस्जिदों का कब्जा मुसलमानो को देना होंगा. महात्मा गांधी की इस मांग को मानते हुए हिंदु-शीखोंने मस्जिदों को मुसलमानो को सौंप दिया. हिंदु अंतरमन की वेदना कितनी विचलित करनेवाली होंगी कि नाथूराम गोडसे नाम के एक व्यक्तिने महात्मा गांधी को तीन गोलियां दागकर मार डाला? (यहां गांधीजी कि हत्या को ऊचित ठहेराने का कोई प्रयास नहीं है, किन्तु हिंदुओं के हितो को नुकसान पहोंचानेवाली बातें नग्न सच के नाते सामने आई तो उसका क्या परिणाम हुआ, यह दिखाने का ही उदेश्य है.)

सरदार पटेल के मृत्यु के बाद देशमें कॉंग्रेस के द्वारा मुसलमानों को वोटबैंक के रुप में ही देखा गया. मुसलमानों के वोट लेने केलिए उन्होने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति सेक्युलारिज्म के नाम से खुल्ले तौर पर चालु की. मदरसो कि स्थापना हो, मुस्लिमों को हजयात्रा केलिए सबसिडी देना हो, मुस्लिम गुंडों कि असमाजिक प्रवृतिओं को अनदेखा करना हो, काश्मीर में अलगतावादीओं को सर ऊंचा करने केलिए ढीली नीति अपनाने की बात हो, कॉंग्रेस इन सब बातों में अव्वल रही है. मुस्लिम तुष्टिकरण की कॉंग्रेसी मानसिकता में आनेवाली विकृतिआं समय समय पर बढती गई.

हाल के समय में मुस्लिम-ईसाई और अन्य लघुमती समुदायों को धर्म के आधार पर आरक्षण देने की पेरवी करना, बांग्लादेशी घूसपैठियों के प्रति नरम रवैया रखना, आतंकवाद के खिलाफ सख्त कानून को राजनीति के चलते नहीं आने देना, हिंदु आतंकवाद की बात को उछाल कर हिंदु संगठनो को लश्करे तोईबा से भी खतरनाक बताना, सांप्रदायिक हिंसा को रोकने केलिए हिंदु विरोधी कानून तैयार करना, रामसेतु तोडने केलिए सेतुसमुद्रम परियोजना को आगे बढाने केलिए कोशिशे करना, काश्मीर के अलगतावादीओं को दिल्ही में सेमिनार करने देना, पाकिस्तान के विरुद्ध अस्पष्ट नीति रखना, अफजल गूरु जैसे आतंकवादी को संसद पर हमला करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा फांसी की सजा मिली है, फिर भी कुछ नहीं करना- जैसी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतिआं कॉंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की प्रेरणा और कुछ दंभी सेक्युलर संगठनो के सीधे दोरीसंचार से आगे बढा रही है.

मुस्लिम तुष्टिकरण की राष्ट्रविरोधी कॉंग्रेसी-सेक्युलर नीतिओं के खिलाफ हिंदुओं में राख के नीचे अंगारे भडक रहे है. किन्तु हद तो तब होती है कि हिंदुत्व की बात करनेवाला भाजप भी इन तमाम मुद्दो पर सेक्युलर बनकर के बर्ताव कर रह्या है. मुस्लिम भी भाजप के साथ है, यह दिखाने केलिए भाजप के दिग्गज और केन्द्रीय नेता भरचक प्रयास कर रहे है. तब हिंदु अंतरमन को वेदना होना स्वाभाविक है. कॉंग्रेसने तो राष्ट्रविरोधीओं के प्रति नरम रुख के चलते हिंदु अंतरमन का हंमेशा निरादर किया है. किन्तु हिंदु अंतरमन की अवमानना अपने आप को हिंदुत्ववादी कहेनेवाले भाजप के द्वारा होती है, तो उसकी वेदना विराट हिंदु समाज के हर व्यक्ति को होना अनिवार्य है. लेकिन राजनीतिक छलावे से साशंकित विराट हिंदु समाज की वेदनाओं को राजनीतिक अभिव्यक्ति देने का कोई साधन हाल के समय में उपलब्ध नहीं है. तो ऐसी स्थिति तो भारत केलिए और उसके विराट हिंदु समाज केलिए बेहद खतरनाक करार दी जाती रही है. कुछ हिंदुत्ववादी चिंतको का कहेना है कि ऐसी स्थिति में हिंदु संगठनो के नेताओं को हिंदुओं की राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक अभिव्यक्ति के एकमात्र साधन भाजप को सीधा अल्टीमेटम दे देना चाहिए कि हिंदुओं की भावनाओं और मांगो की ईज्जत करे. अगर ईन सब बातो के चलते भाजप अपने मार्ग पर वापिस नहीं आता, तो हिंदुओं को अपनी सटीक राजनीतिक अभिव्यक्ति केलिए हिंदु अंतरमन की वेदनाओं को ध्यान में रखकर हिंदु संगठनों और नेताओं को अन्य विकल्पों का विचार करना चाहिए.

भारत में हिंदु पहेचान प्रस्थापित करने, उसे द्रढीभूत करने, उसे बनाये रखने केलिए राजनीतिक बल की आवश्यकता रहेनेवाली है. अगर राजनीतिक बल कमजोर होगा या दोहरे चरित्रवाला होगा, तो उसका नुकसान हिंदु पहेचान को होगा. भारत का आत्मा हिंदुत्व है, हिंदुओं और हिंदुत्व को नुकसान अंत में भारत को नुकसान है. तब हिंदुत्व के मुद्दो पर किसी भी प्रकार का समाधान हिंदु जनमत का अनादर करके न हो, वह देखना अति आवश्यक है. अपने हितों को हिंदु समाज कोई संगठन, कोई राजनीतिक पक्ष या कोई नेताओं के हवाले न करे. अपने हितों को नुकसान होने कि स्थिति में हिंदु समाज को स्वयंभू आंदोलन कि कमान अपने हाथो में लेनी आवश्यक है. परंतु ऐसी व्यवस्था के विकल्प केलिए भी कार्यकर्ताओं, नेताओं, संगठन, दल की आवश्यकता रहेंगी.

अगर हिंदु समाज ऐसे स्वयंभू अपने आप के अभिव्यक्त करेगा, तो हिंदुत्व के नाम पर सत्ता पर आने के बाद कोई राममंदिर निर्माण जैसे भावनात्मक मुद्दे पर राजनीति नहीं करेंगा, कोई गोहत्या प्रतिबंधक कानून को बनाके भूल नहीं जायेगा, कंधारकांड की तरह कोई आतंकवादीओं को मुक्त करने की हिंमत नहीं करेगा, संसद पर हमले के बाद आरपार की लडाई की कविताएं करने की कोई हिंमत नहीं कर पायेगा, कोई पाकिस्तान को पाठ पढाने की बजाये शांतिवार्ता की माला नहीं जपेगा, कोई सरकार हिंदु मंदिरों को अपने कब्जे में लेकर के मुस्लिमो को हजयात्रा केलिए सबसिडीयां देने की जुर्रत नहीं करेगा, कोई उर्दू के शिक्षकों को बडे पैमाने पर भरती नहीं करेगा, कोई हजयात्रा की सबसिडी में ज्यादा वृद्धि और सुविधाएं देने की हिंमत नहीं कर सकेगा.